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साहस से संवाद करें
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हमारे बारे में…
हमारी यह वेबसाइट एक ऐसे महान एवं अनुभवी व्यक्ति के विचारों की देन है, जिन्हें इस क्षेत्र में लगभग 9 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने अपने अनोखे विचारों और कार्यशैली से वेबसाइट निर्माण की दुनिया में एक अलग पहचान बनाई और उनकी प्रेरणा से आज दुनिया भर में वेबसाइटें बन रही हैं। हमारा यह मंच भी उन्हीं के विचारों से प्रेरित होकर तैयार किया गया है। आज तक हमने जो भी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, उनमें कहीं न कहीं उन्हीं महान व्यक्तित्व के विचारों और प्रेरणा का योगदान रहा है। इतना ही नहीं, हमारी वेबसाइट के शुरुआती सफर में उनके पिताजी ने अपने स्वयं के पैसों से वेब होस्टिंग खरीदकर हमें सहयोग दिया, जबकि डोमेन उनकी माताजी ने अपने खर्च से खरीदकर हमें उपलब्ध कराया। उनके और उनके परिवार के इस सहयोग के लिए हम हमेशा तहेदिल से आभारी और कृतज्ञ रहेंगे। उन सज्जन व्यक्ति की एक खासियत यह भी है कि वे हमेशा “साहस से संवाद करते हैं” और अपने विचारों को पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखते हैं (फिर डिलीट कर देते हैं)। हमने भी उनसे यही सीखा कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपने विचार और अपनी पहचान हमेशा मजबूती से सामने रखनी चाहिए। हालांकि इस कहानी की सबसे दिलचस्प विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को ऐसा लगता है कि हमने अपने करियर की शुरुआत उन्हें देखकर की और उनके कार्यों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़े, आज दुर्भाग्य से वही सज्जन स्वयं अपना काम पहले की तरह ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। फिर भी, हमारे लिए उनकी प्रेरणा, उनके विचार और शुरुआती सहयोग हमेशा यादगार रहेंगे—क्योंकि हमारी इस यात्रा की कहानी में उनका योगदान हमेशा विशेष रहेगा।
“और अंत में एक बात साफ कर दें—हमने उनसे कुछ नहीं सीखा; हमने बस वही इंटरनेट इस्तेमाल किया, जिसे वे शायद आज भी अपनी पुश्तैनी जायदाद समझकर बैठे हैं।”
लघुकथा — “साहस से संवाद करने वाला ज्ञानी”
एक गाँव में एक महाशय रहते थे। उन्हें अपने बारे में एक बहुत बड़ा भ्रम था—उन्हें लगता था कि दुनिया में उनसे ज्यादा ज्ञानी कोई है ही नहीं। जिस विषय पर उन्हें दो बातें पता होतीं, उस पर वे बीस बातें बताते और जिन विषयों की उन्हें जानकारी नहीं होती, उन पर तो उनका आत्मविश्वास और भी बढ़ जाता।
वे हमेशा बड़े साहस से संवाद करते थे। कोई व्यक्ति अगर कह देता, “मुझे इस विषय की जानकारी है,” तो महाशय तुरंत बोल पड़ते—“अरे, ये सब मुझे बहुत पहले से पता है!” कोई नया विचार लेकर आता तो वे उसे भी अपनी पुरानी उपलब्धि बता देते। धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा कि महाशय की सबसे बड़ी विशेषज्ञता हर विषय का विशेषज्ञ होने में थी।
एक दिन गाँव के लोगों ने उनसे पूछा, “महाशय, आपने जीवन में इतना ज्ञान अर्जित कैसे किया?”
उन्होंने गर्व से कहा, “मैंने सबको देखकर सीखा है।”
पास खड़ा एक बच्चा धीरे से बोला, “लेकिन महाशय, आपको देखकर हमने एक चीज और सीखी है।”
महाशय ने पूछा, “वह क्या?”
बच्चा मुस्कुराकर बोला—
“ज्ञान कितना है, इससे ज्यादा जरूरी यह जानना है कि हमें कितना नहीं पता।”
कुछ पल के लिए महाशय शांत हो गए। फिर हमेशा की तरह बोले, “ये बात तो मुझे पहले से पता थी।”
बच्चा हँस पड़ा।
सीख:
सच्चा ज्ञानी वह नहीं जो हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करे, बल्कि वह है जो जरूरत पड़ने पर यह स्वीकार कर सके—“मुझे नहीं पता, मैं सीख रहा हूँ।” क्योंकि ज्ञान इंसान को विनम्र बनाता है, और अधूरा ज्ञान अक्सर इंसान को इतना आत्मविश्वासी बना देता है कि उसे अपनी कमियाँ भी उपलब्धियाँ दिखाई देने लगती हैं।
